India US Trade Deal पर सियासी घमासान; पीयूष गोयल बोले- ‘Silent Diplomacy’ से घटे टैरिफ

Donald Trump Truth Social

केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल

भारत और अमेरिका के बीच हुई नई ट्रेड डील को लेकर देश की राजनीति गरमा गई है। विपक्ष, खासकर कांग्रेस, इस बात पर सवाल उठा रहा है कि जब समझौते का ऐलान हुआ तो प्रधानमंत्री ने देश को संबोधित क्यों नहीं किया और इसकी जानकारी पहले अमेरिका से क्यों आई। दूसरी ओर, केंद्रीय वाणिज्य मंत्री Piyush Goyal ने साफ शब्दों में कहा है कि टैरिफ घटाने का फैसला अमेरिका की तरफ से लिया गया था, इसलिए वहां के राष्ट्रपति Donald Trump ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर पहले इसका जिक्र किया। गोयल ने यह भी जोड़ा कि इस डील में भारत के किसी भी सेक्टर के हितों से समझौता नहीं हुआ है और आने वाले समय में इससे निर्यात, निवेश और रोजगार के बड़े अवसर खुलेंगे।

उत्तर प्रदेश जैसे बड़े और कृषि-प्रधान राज्य में इस खबर को लेकर खास दिलचस्पी देखी जा रही है, क्योंकि यहां के किसान, बुनकर, छोटे उद्योग और निर्यातक लंबे समय से विदेशी बाजारों तक बेहतर पहुंच की उम्मीद लगाए बैठे थे। सरकार का दावा है कि नई व्यवस्था से टेक्सटाइल, इंजीनियरिंग पार्ट्स, मरीन प्रोडक्ट्स और ज्वेलरी जैसे क्षेत्रों को सीधा फायदा मिलेगा, जिसका असर प्रदेश के कई जिलों में भी दिख सकता है।


कांग्रेस के सवाल और अमेरिका से ऐलान पर उठी बहस

डील सामने आते ही कांग्रेस ने सरकार पर सवालों की झड़ी लगा दी। पार्टी के वरिष्ठ नेता Rahul Gandhi और अन्य प्रवक्ताओं ने पूछा कि इतने बड़े अंतरराष्ट्रीय समझौते पर प्रधानमंत्री Narendra Modi ने राष्ट्र को संबोधित क्यों नहीं किया। विपक्ष का यह भी आरोप था कि ट्रंप ने अपनी पोस्ट में दावा किया है कि भारत अमेरिकी सामानों पर ड्यूटी लगभग शून्य कर देगा, जिसे कांग्रेस ने ‘सरेंडर’ करार दिया।

कांग्रेस नेताओं का कहना था कि ट्रंप अपने समर्थकों के बीच इस समझौते को अपनी जीत के तौर पर पेश कर रहे हैं और भारत सरकार चुपचाप शर्तें मान रही है, इसलिए घोषणा भी वाशिंगटन से पहले हुई। पार्टी का यह भी तर्क था कि यदि समझौता वाकई भारत के लिए इतना फायदेमंद है, तो सरकार को पूरी पारदर्शिता के साथ उसकी शर्तें देश के सामने रखनी चाहिए।

उत्तर प्रदेश में विपक्षी नेताओं ने भी इसी मुद्दे को लेकर बयान दिए। लखनऊ से लेकर प्रयागराज तक कई जगहों पर कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर सवाल उठाए कि क्या इस डील से स्थानीय उद्योगों को वाकई लाभ होगा या फिर सस्ते अमेरिकी उत्पादों से घरेलू बाजार पर दबाव पड़ेगा। खास तौर पर डेयरी और कृषि क्षेत्र को लेकर शंकाएं जताई गईं, क्योंकि ये यूपी की अर्थव्यवस्था की रीढ़ माने जाते हैं।


‘साइलेंट डिप्लोमेसी’ की दलील और टैरिफ घटने की कहानी

पीयूष गोयल ने विपक्ष के आरोपों का जवाब देते हुए कहा कि कूटनीति में हर बात सार्वजनिक मंच से नहीं की जाती। उनके मुताबिक, कुछ महीने पहले जब अमेरिकी प्रशासन ने भारतीय उत्पादों पर 50 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने का ऐलान किया था, तब दुनिया भर में इसे ‘टैरिफ वॉर’ कहा जा रहा था। उस समय भारत सरकार ने संयम बरतते हुए न तो तीखी बयानबाजी की और न ही तुरंत जवाबी कदम उठाए।

गोयल का कहना है कि पर्दे के पीछे लगातार बातचीत चलती रही, जिसके नतीजे अब सामने आए हैं और टैरिफ 50 प्रतिशत से घटकर 18 प्रतिशत तक आ गए हैं। उन्होंने इसे प्रधानमंत्री की रणनीतिक सोच और धैर्य का परिणाम बताया। मंत्री ने जोर देकर कहा कि कृषि और डेयरी जैसे संवेदनशील क्षेत्रों की सुरक्षा सरकार की प्राथमिकता रही है और इन पर कोई समझौता नहीं किया गया।

उन्होंने यह भी कहा कि अमेरिका के साथ संबंध केवल व्यापार तक सीमित नहीं हैं, बल्कि रणनीतिक साझेदारी, तकनीक और निवेश जैसे क्षेत्रों में भी दोनों देशों के बीच सहयोग बढ़ रहा है। उत्तर प्रदेश के संदर्भ में देखें तो यहां के हथकरघा उद्योग, चमड़ा कारोबार और खाद्य प्रसंस्करण सेक्टर को विदेशी बाजारों तक पहुंच मिलने की संभावना जताई जा रही है। कानपुर, वाराणसी और मेरठ जैसे शहरों के निर्यातकों को उम्मीद है कि नई डील से ऑर्डर बढ़ सकते हैं और स्थानीय स्तर पर रोजगार के मौके खुलेंगे।


निर्यात, निवेश और रोजगार पर सरकार का भरोसा

पीयूष गोयल ने मीडिया से बातचीत में कहा कि यह ट्रेड डील भारत की अर्थव्यवस्था के लिए गेम-चेंजर साबित हो सकती है। उनके मुताबिक, इंजीनियरिंग गुड्स, टेक्सटाइल, मरीन प्रोडक्ट्स और ज्वेलरी सेक्टर को अमेरिकी बाजार में ज्यादा मौके मिलेंगे। इससे न केवल बड़े उद्योगों को फायदा होगा, बल्कि छोटे-मझोले उद्यमों और कारीगरों तक इसका असर पहुंचेगा।

उन्होंने विपक्ष पर भी निशाना साधते हुए कहा कि कुछ नेता हर सकारात्मक पहल में नकारात्मकता ढूंढने की कोशिश करते हैं और उन्हें इस रवैये के लिए देश से माफी मांगनी चाहिए। मंत्री ने ट्रंप का धन्यवाद करते हुए कहा कि उन्होंने भारत के साथ मित्रता का सम्मान किया और प्रतिस्पर्धी देशों की तुलना में बेहतर शर्तों पर समझौता किया।

उत्तर प्रदेश में उद्योग संगठनों की प्रतिक्रिया फिलहाल सतर्क लेकिन उम्मीद भरी है। नोएडा और गाजियाबाद के इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरर्स का मानना है कि यदि अमेरिकी कंपनियां भारत में निवेश बढ़ाती हैं तो सप्लाई चेन का बड़ा हिस्सा यूपी में विकसित हो सकता है। वहीं, पूर्वांचल के कृषि-उत्पाद निर्यातक इस बात पर नजर रखे हुए हैं कि नई व्यवस्था से उनके लिए शुल्क और प्रक्रियाएं कितनी आसान होती हैं।


आगे क्या, संयुक्त बयान और राजनीतिक असर

सरकार का कहना है कि भारत और अमेरिका जल्द ही इस ट्रेड डील पर संयुक्त बयान जारी करेंगे, जिसमें सभी शर्तों और भविष्य की योजनाओं को स्पष्ट किया जाएगा। इससे उम्मीद की जा रही है कि विपक्ष के कई सवालों का जवाब सामने आ जाएगा और कारोबारी जगत को भी दिशा मिलेगी।

राजनीतिक तौर पर यह मुद्दा आने वाले महीनों में और गरमा सकता है, खासकर तब जब राज्यों में चुनावी माहौल बन रहा हो। उत्तर प्रदेश में जहां रोजगार, किसान और छोटे उद्योग हमेशा चुनावी बहस के केंद्र में रहते हैं, वहां इस डील के संभावित असर को लेकर चर्चा तेज होने की संभावना है। सरकार इसे आर्थिक कूटनीति की सफलता बता रही है, जबकि विपक्ष पारदर्शिता और शर्तों पर जोर दे रहा है।

फिलहाल इतना तय है कि भारत-अमेरिका व्यापारिक रिश्तों में यह नया अध्याय दोनों देशों के लिए अहम माना जा रहा है। असली तस्वीर तब साफ होगी, जब डील के प्रावधान जमीन पर उतरेंगे और निर्यात, निवेश व रोजगार के आंकड़ों में इसका असर दिखने लगेगा। तब तक सियासी बयानबाजी और आर्थिक उम्मीदों का यह दौर जारी रहने वाला है।

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