लखनऊ (राजधानी न्यूज): उत्तर प्रदेश में त्रिस्तरीय पंचायतों का संवैधानिक कार्यकाल समाप्त होने से ठीक आठ दिन पहले सोमवार को राजधानी लखनऊ में सियासी पारा चढ़ गया। अखिल भारतीय ग्राम प्रधान संगठन के बैनर तले प्रदेशभर से आए हजारों ग्राम प्रधानों, क्षेत्र पंचायत सदस्यों (BDC) और जिला पंचायत सदस्यों ने हजरतगंज स्थित जीपीओ (GPO) गांधी प्रतिमा पर ‘लोकतंत्र बचाओ, पंचायत बचाओ’ अभियान के तहत विशाल विरोध प्रदर्शन किया। इस बड़े आंदोलन के बीच प्रदेश के उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक खुद प्रदर्शनस्थल पर पहुंचे और आंदोलनकारी प्रतिनिधियों को मिठाई खिलाकर शांत कराया।
डिप्टी सीएम ने सुना दर्द, दिया भरोसा
जीपीओ पर चल रहे धरने के बीच पहुंचे डिप्टी सीएम ब्रजेश पाठक ने पंचायत प्रतिनिधियों की मांगों और चिंताओं को बेहद गंभीरता से सुना। उन्होंने प्रदर्शनकारियों को आश्वस्त करते हुए कहा, “योगी सरकार किसी भी जनप्रतिनिधि या ग्रामीण जनता के साथ अन्याय नहीं होने देगी। हमारा पूरा प्रयास है कि प्रदेश में पंचायत चुनाव बिल्कुल समय पर संपन्न हों और इसके लिए पूरी रूपरेखा तैयार की जा रही है। समय पर चुनाव कराना और ग्रामीण क्षेत्रों का विकास सुनिश्चित करना हमारी सबसे बड़ी प्राथमिकता है।”
26 मई को खत्म हो रहा है कार्यकाल: प्रशासक राज का विरोध
प्रदर्शन का नेतृत्व कर रहे संगठन के प्रतिनिधि ज्ञानेंद्र सिंह ने सरकार के सामने पंचायतों की संवैधानिक स्थिति को स्पष्ट किया। उन्होंने कहा कि उत्तर प्रदेश में त्रिस्तरीय पंचायतों का कार्यकाल आगामी 26 मई 2026 को समाप्त हो रहा है।
संवैधानिक गारंटी का हवाला: भारतीय संविधान के भाग-9 के अनुच्छेद 243-E और 243-K के तहत पंचायतों के नियमित और समयबद्ध चुनाव कराने की संवैधानिक गारंटी दी गई है। सरकार को इसे किसी भी कीमत पर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।
नौकरशाही का विरोध: ज्ञानेंद्र सिंह ने चेतावनी दी कि पंचायतों पर सरकारी प्रशासक (अधिकारी) नियुक्त करने की किसी भी कोशिश को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। निर्वाचित ग्राम प्रधानों को हटाकर नौकरशाही के माध्यम से पंचायतों का संचालन करना ग्रामीण जनता के लोकतांत्रिक अधिकारों का सीधा हनन होगा।

मांग: चुनाव में देरी हो तो प्रधान ही बनें कार्यवाहक प्रशासक
ग्राम प्रधान संगठन ने सरकार के सामने साफ रुख रखते हुए मांग की है कि:
समय पर हो चुनाव: प्रदेश में पंचायत चुनाव पूरी तरह संविधान के अनुरूप समय पर ही कराए जाएं और पंचायतों पर किसी भी प्रकार का बाहरी प्रशासक न थोपा जाए।
एमपी-राजस्थान का फॉर्मूला लागू हो: यदि ओबीसी आयोग की रिपोर्ट या किसी अन्य तकनीकी कारणवश चुनाव में थोड़ी भी देरी होती है, तो मध्य प्रदेश और राजस्थान की सरकारों की तर्ज पर उत्तर प्रदेश में भी निर्वाचित ग्राम प्रधानों को ही उनके प्रशासनिक एवं वित्तीय अधिकार सौंपते हुए ‘कार्यवाहक प्रशासक’ घोषित किया जाए।




