संसद में 54 वोटों से गिरा महिला आरक्षण बिल: मोदी सरकार की बड़ी विधायी हार, 2/3 बहुमत न मिलने से 2034 तक टला

नई दिल्ली/लखनऊ: भारतीय राजनीति के इतिहास में एक अप्रत्याशित घटनाक्रम के तहत मोदी सरकार लोकसभा में ‘महिला आरक्षण से जुड़ा संविधान का 131वां संशोधन बिल’ पास कराने में विफल रही है। 543 सीटों को बढ़ाकर 850 करने के प्रावधान वाले इस बिल को पारित करने के लिए जरूरी 352 वोटों (दो-तिहाई बहुमत) के मुकाबले सरकार को केवल 298 वोट ही मिले। उपस्थित 528 सांसदों में से 230 ने बिल के विरोध में मतदान किया, जिसके कारण यह बिल 54 वोटों के अंतर से गिर गया।

यह मोदी सरकार के 12 साल के कार्यकाल में पहला मौका है जब सदन में सरकार का कोई बिल गिर गया हो। संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने इसके साथ जुड़े दो अन्य बिलों पर वोटिंग कराने से भी इनकार कर दिया।

NDA के पास संख्या बल की कमी, शाह ने विपक्ष को घेरा

वोटिंग के आंकड़ों ने एनडीए (NDA) की आंतरिक सीमा को उजागर कर दिया:

गणित का फेर: एनडीए के पास अपने 293 सांसद हैं। बिल के पक्ष में पड़े 298 वोटों से साफ है कि भाजपा केवल 5 अन्य बाहरी सांसदों को ही मना पाई। विपक्ष को भरोसे में न ले पाना सरकार की इस हार का मुख्य कारण बना।

अमित शाह की चेतावनी: वोटिंग से पहले गृह मंत्री अमित शाह ने एक घंटे के भाषण में स्पष्ट कहा था कि यदि यह बिल गिरता है, तो इसकी पूरी जिम्मेदारी विपक्ष की होगी।

अब क्या होगा? कानूनी और राजनीतिक असर

भले ही यह संशोधन बिल गिर गया हो, लेकिन 2023 में बना ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ (16 अप्रैल 2026 को नोटिफाई) लागू रहेगा। हालांकि, इसका वास्तविक लाभ अब 2034 के लोकसभा चुनाव से ही मिल पाएगा, क्योंकि इसके लिए 2027 की जनगणना और उसके बाद होने वाला परिसीमन अनिवार्य है।

सरकार के पास अब क्या विकल्प हैं?

बदलाव के साथ नया बिल: सरकार दक्षिणी राज्यों की चिंताओं (सीटों की ताकत कम होने का डर) को दूर करते हुए 2027 की जनगणना को आधार बनाकर नया ड्राफ्ट पेश कर सकती है।

विपक्ष से सहमति: क्षेत्रीय दलों के सुझावों को शामिल कर नए सिरे से सर्वसम्मति बनाने का प्रयास।

विवाद की जड़: उत्तर बनाम दक्षिण भारत

विपक्ष ने महिला आरक्षण का विरोध नहीं किया, बल्कि इसके साथ जुड़े ‘परिसीमन’ के तरीके पर सवाल उठाए:

दक्षिणी राज्यों का डर: विपक्ष का आरोप था कि आबादी के आधार पर परिसीमन से उत्तर भारतीय राज्यों की सीटें बढ़ेंगी और जनसंख्या नियंत्रण करने वाले दक्षिण भारतीय राज्य शक्तिहीन हो जाएंगे।

अमित शाह का तर्क: शाह ने आंकड़ों के जरिए बताया कि दक्षिण के 5 राज्यों की सीटें 129 से बढ़कर 195 हो जाएंगी और उनका प्रतिनिधित्व प्रतिशत 23.76 से बढ़कर 23.87 होगा, अतः किसी का नुकसान नहीं होगा।

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