राजधानी लखनऊ से गुरुवार को एक अहम राजनीतिक प्रतिक्रिया सामने आई, जब मायावती ने यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन के नए इक्विटी नियमों पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा लगाई गई रोक को “उचित” करार दिया। उनका कहना है कि इन नियमों को लेकर देशभर के विश्वविद्यालयों में सामाजिक तनाव की स्थिति बन गई थी, जिसे देखते हुए अदालत का हस्तक्षेप जरूरी था।
बहुजन समाज पार्टी प्रमुख मायावती ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर जारी अपने बयान में कहा कि यदि नियम लागू करने से पहले सभी वर्गों और पक्षों को भरोसे में लिया जाता, तो इस तरह की स्थिति पैदा नहीं होती।
उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय परिसरों में जाति आधारित घटनाओं को रोकने के उद्देश्य से बनाए गए नियमों का मकसद सही हो सकता है, लेकिन प्रक्रिया में संतुलन और संवाद का अभाव विवाद का कारण बना।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद तेज हुई बहस
इस विवाद के केंद्र में सुप्रीम कोर्ट का वह आदेश है, जिसमें नए UGC नियमों पर फिलहाल रोक लगा दी गई है। अदालत ने कहा कि नए प्रावधानों की भाषा में अस्पष्टता है और उनके दुरुपयोग की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।
अदालत ने निर्देश दिया कि जब तक मामले की आगे सुनवाई नहीं हो जाती, तब तक पुराने नियम ही लागू रहेंगे। कोर्ट ने खासतौर पर उस प्रावधान पर चिंता जताई जिसमें जाति आधारित भेदभाव की परिभाषा को लेकर स्पष्टता की कमी बताई गई।
इस आदेश के बाद देशभर के विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में जारी बहस को नई दिशा मिल गई है, क्योंकि कई छात्र संगठनों और शिक्षण संस्थानों ने पहले ही नियमों पर आपत्ति जताई थी।

नए नियमों को लेकर क्या था विवाद
यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन द्वारा जनवरी में अधिसूचित नए नियमों का उद्देश्य उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता और भेदभाव विरोधी तंत्र को मजबूत करना बताया गया था।
नियमों के तहत कॉलेजों और विश्वविद्यालयों को अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के छात्रों की शिकायतों के निपटारे के लिए विशेष समितियां और हेल्पलाइन स्थापित करने का निर्देश दिया गया था।
लेकिन कई छात्रों और समूहों ने आरोप लगाया कि नियमों की संरचना में संतुलन का अभाव है और सामान्य वर्ग के छात्रों के खिलाफ दर्ज होने वाली संभावित झूठी शिकायतों से निपटने के लिए पर्याप्त प्रावधान नहीं किए गए हैं।
इसी मुद्दे को लेकर कई याचिकाएं अदालत में दायर की गईं, जिनमें नियमों को मनमाना और संविधान की भावना के विपरीत बताया गया।

मायावती का आरोप: सभी वर्गों को भरोसे में लेना चाहिए था
मायावती ने अपने बयान में कहा कि यदि नियमों को लागू करने से पहले सभी वर्गों और सामाजिक समूहों से चर्चा की जाती और जांच समितियों में विभिन्न समुदायों को संतुलित प्रतिनिधित्व दिया जाता, तो विवाद की स्थिति टाली जा सकती थी।
उन्होंने कहा कि प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के तहत सभी पक्षों की भागीदारी सुनिश्चित होना जरूरी था। उनके अनुसार, संवाद की कमी ने विश्वविद्यालय परिसरों में तनाव का माहौल पैदा कर दिया।


